रविवार, 13 नवंबर 2011

उत्तराँचल की गोद में "रमणीक द्वीप’ ’’

ऊँ श्री हरि चरणों में मेरा यह प्रथम लेख 'जन्म-भूमि, को समर्पित है----------'केवल जोशी'

उत्तराखण्ड प्रदेश में कुंमाऊ रीजन के पूरे पिथौरागड़ जिले को ही इसकी खूबसूरत वादियों के कारण “छोटा कश्मीर” कहा जाता है। यहीं सरयू, रामगंगा (पूर्वी) नरगूल एवं पातालगंगा बहती हैं। सरयू व रामगंगा के सगंम को रामेंश्वरम् कहा जाता है। सरयू व रामगंगा के दोआब वाले सम्पूर्ण (हिमालय तक) के रमणीक इलाके को काव्यों में ‘रमणीक द्वीप’ कहा गया है। संस्क्रत में ‘गंगावली’ कहा गया। ‘गंगोली’ इलाका भी इसे कहा जाता है। ‘नाग- भूमि’ भी इसी दोआब को माना गया है। स्कन्दपुरांण में पूरे ‘गंगावली’ का सन्दर्भ आता है।
“श्रीमदभागवत” में एक संदर्भ आता है - द्वापर युग में भगवान श्रीकॄष्ण ने यमुना नदी में जब कालीनाग को साध कर मुक्ति दी तब कालीनाग को अपने लाव लस्कर सहित ‘रमणीक द्वीप’ में जाने को कहा गया। (किंबदन्ति है कि कालीनाग पूर्व जन्म में स्वर्ग लोक में राजा थे। कारण बस किसी देवता से श्रापित होकर मथुरा-यमुना नदी में सजा काट रहे थे) कालीनाग अपने कुटुम्ब सहित अत्यधिक परेशान हुए और भगवान श्रीकॄष्ण से अपने भरण- पोसण / सुरक्षा हेतु विनय की। तब श्रीकॄष्ण ने बरदान दिया कि ‘रमणीक द्वीप’ के वासिन्दे लोग तुम्हे पूजैगे एवं जो लोग सच्ची लगन व श्रद्धा से पूजा करैगे वो मेंरी भक्ति को प्राप्त होगे”। कालीनाग अपने परिवार-श्री पिंगलीनाग, धौलीनाग, मूलनाग, फणीनाग, वासुकीनाग, बेरीनाग आदि सहित ‘रमणीक द्वीप’ के रमणीक पर्वत (कालिनाग डाना) एवं आसपास की पर्वत श्रखलऔं म़ें बस गये और स्थानीय लोगों द्वारा श्री हरि विष्णु स्वरूप ईष्ट देव रूप में बहुत आस्था व श्रद्धा से तभी से पूजे जाते आ रहे हैं।
‘रमणीक द्वीप’ के पर्वत काफी ढलान लिये हुए हैं जल संचय की सम्भावनाऔं के कारण भूमिं उपजाऊ एवं पर्यावरण सदा हरा भरा व सुरम्य है। यहां की पहाड़ियां कुमायूं की अन्य पहाड़ियों से पक्की हैं, सड़कैं दूर दूर, पर बरषात में कम बाधित रहती हैं। यहां प्रायः सभी तरह की फसलें पैदा होती है। पुरानी कहावत है -

केला, निम्बू, अखोड़, दाणिम, रीखू, नारिगं, आदो, दही ।
खासो भात जमाली को, गलगलो, भूना गडेरी गवा ।
च्यूड़ा, सद्य उत्योल दूध, बाकलो घ्यू गाय को दाणोदार ।
खांनि सुन्दर मौणियाँ, धबड़वा गंगावली रौंणियाँ ।
बने, बने काफल, किल्मोड़ो छः, बेडु और हिसालू छः।
उँचा धुर रिगाल,बा`ज, बुरा`श, सेराओ` में` आम, अमरूदो छः।
 बाड़ा में तोरी, काकड़ो छः, आरू, और खुबानी` छः।
 गोठन में गोरू लैंण, भैस बाखड़ो छः, उत्तम बल्द, बहड़ो छः।

उत्तर में हिमालय – नन्दादेवी, पन्चचूली की उन्नत चोटियाँ अंधेरी रात में भी चाँदनीं का आभाष कराती हैं। मुख्य बाजार- गंगोलीहाट, बेरीनाग, चौड़मन्या, थल, कांडा, धरमघर, पांखू व सानिउडियार है।

मुख्य पर्यटन स्थल ’चौकोड़ी’ है जहां कुमांॐ मडंल विकास निगम के गेस्ट हाउस एवं प्राइवेट रिजार्टस् है।

मालदार श्री देबसिंह बिष्ट द्वारा संरश्रित बेरीनाग व चौकोड़ी के चाय बागान प्रसिद्ध हैं।

धार्मिक पर्यटन स्थलों में ‘पाताल भुवनेश्वर’ मुख्य है जो पिथौरागड़ जिले के पश्चमी भाग में गंगोलीहाट के करीब है। “स्कन्द पुराण” में इसका वर्णन है। यह एक गुफा है। कहते हैं, यहां कभी तांबे की खान थी। गुफा के भीतर बहुत सी उपगुफायें हैं। भगवान शिव पार्वती की मूर्तियां सतत् लघुजलप्रवाह के कारण स्वतः बनी हुई प्रतीत होती हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ तीनों मूर्तियां, साथ में काल भैरव की जीभ है, भगवान शिव का मनोकामना झोला है, कहा जाता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां बिताया था, इस गुफा में 33 करोड़ देवताओं के बीच भगवान शिव का नर्मदेश्वर लिगं है फिर आकाशगंगा है जिसमें सप्तर्षि मडंल है। कहते हैं, इस गुफा की एक उपगुफा में एक हिरन के पीछे एक कुत्ता गया था जो काशी पहुंचे थे, ‘मानस खण्ड’ में इसका वर्णन है। प्रसिद्ध लेखक ‘राहुल सांक्रत्यायन’ ने भी इस गुफा का वर्णन किया है, यहां भी ‘कुमांॐ मडंल विकास निगम’ के गेस्ट हाउस एवं प्राइवेट रिजार्टस् हैं।

‘महाकाली मन्दिर’ गंगोलीहाट से कुछ ही दूरी पर देवदार झुरमुट के बीच स्थित है, यह मनोकामना पूर्ण करने वाली "माँ” महिषासुर-मर्दिनी देवी की पीठ है, चैत्र व क्वार माह की अष्टमी को मेंला लगता है, अब भी बकरे व भैंसे की बलि देने के समाचार यदा कदा मिलते है। कहते हैं कि देवी जी के साथ महिषासुर ने युद्ध इसी गंगोली में किया था, जिसमें महिषासुर, चडंमुडं, रक्तवीर्य आदि दैंत्य मारे गये। काली देवीजी के मन्दिर की जड़ में पातालगंगा बताई जाती है, भीतर ही भीतर गुफा में बहते हुए सरयू व रामगंगा के सगंम रामेंश्वरम् में मिलती है।

‘कोटेश्वर महादेव’ गंगोलीहाट व बेरीनाग के बीच राँईआगर के पास है, यहां भी गुफा के भीतर महादेव हैं, पुंगेश्वर, छीड़ेश्वर (गराऊं-लालुका) व जगथली में अन्य शिव मन्दिर हैं। सानिउडियार शान्डिल्य ऋषि की तपोभूंमि है। यहां से लगभग 2 किमी दूर ‘भद्रकाली’ देवी का मन्दिर है, चैत्राष्टमी को मेंला लगता है ।

‘कालीनाग’ मन्दिर उँचे रमणीक पर्वत (पुगरांऊ- पट्टी) की चोटी पर है इसे ‘कालीनाग डाना’ कहा जाता है, भगवान श्रीकृष्ण के वरदान से इसके उपर गरुड़ पंछी आज भी नहीं उड़ते, स्त्रियों का प्रवेश व लोहे का सामान वर्जित है, सावन- भादो नागपंचमीं को मेंला लगता है।

‘कोटगाड़ी देवी’(कोकिला देवी) मन्दिर पुगरांऊ-पट्टी में रमणीक पर्वत के मध्य मदीगांव में है, कोकिला मैंया न्याय की देवी है, अन्याय के विरुद्ध अन्तर्मन से कियी गयी पुकार (शिकायत) की अवश्य ही सुनवाई होती है और दोषी को उसकी गलती का एहसास कराकर दण्डित किया जाता है । चैत्र व कार्तिक नवरात्रियों की अष्टमी को मेंला लगता है, मन्दिर में अब बलिप्रथा बन्द है।

पिगंलीनाग मन्दिर - कालीनाग दरवार में गुरु पद आसीन(पिगंलाचार्य) मुख्य मन्दिर रमणीक पर्वत के दश्रिणी पहाड़ी, इग्यारहपाली (बड़ाँऊ ),गांव ‘जगथली’ के उपर ‘कान्हाखेत’ के पास स्थित है, कार्तिक पूर्णिमा को मेंला लगता है, नाग शीस मन्दिर पहाड़ी की चोटी पर – पिगंलीनाग शिखर है, नव सम्वतसर् (नववर्ष) के प्रथमा को स्थानीय लोग ‘शीक’ (फसल की पहली भेंट) चढ़ाते हैं, यह अति सुरम्य स्थान है,

यहां से चारों तरफ राउडं सेप पहाड़ियां, उत्तर में उन्नत हिमालय- श्रंखलायें, नींचे सर्प की भांति बल खाती सड़कैं व लहलहाते खेतों के विहंगम दृष्य मनोहारी लगते है।

मूलनाग (मूलनारायण) मन्दिर – मुख्य मन्दिर चौकोड़ी में है, धरमगर से उत्तर में मूलनागजी का “शिखर” मन्दिर है, मुख्य ‘शिखर’ यही है जो कि ‘पिगंलीनाग शिखर’ से कहीं अधिक ऊची चोटी है, जाहिर है यह शिखर और अधिक रमणीक होगा, जाड़ों में तीन माह यहां बर्फ ही बर्फ रहती है, इतनी उंचाई के बावजूद यहां जलश्रोत है, जिसे ‘विंवर’ (धरती के भीतर नींचे को गुफा में जलाशय) कहते है। कहा जाता है कि इस गुफा का निकाश भी काशी में है। शिखर पहाड़ के उत्तरी घाटी में ‘भनार’ श्रीबंजैंण जी का मन्दिर है व दश्रिण में ‘सनगाड़’ श्रीनौलिंग जी का मन्दिर है, कपकोट (पूर्व मुख्यमंत्री- श्री भगत सिंह कोश्यारी का गृहनगर) यहां से कुछ ही दूर है।

‘नौलिंग- बंजैंण’ दोनों भाई बहुत प्रतापी एवं मूलनाग जी के पुत्र थे, शिखर पहाड़ के दोनों तरफ क्रमशः इनके मन्दिर हैं, स्थानीय लोगों में इनके प्रति अगाध श्रद्धा एवं आस्था है, कार्तिक नवरात्रि नवमी को सनगाड़- नौलिंग जी में मेंला लगता है जो पूरे कुमांऊ में प्रसिद्ध है। बेरीनाग, धौलीनाग, वासुकीनाग आदि सभी नाग मन्दिरों में नागपंचमी को भी मेंला लगता है।

कमेंड़ी देवी, अन्नपूर्णा मन्दिर पोखरी- विजयपुर, चौकोडी- बागेश्वर रोड पर हैं । ‘कान्डा’ में ‘देवी’ मन्दिर है।

दिल्ली से हल्द्वानी – भीमताल - अल्मोडा – कौसानी – बैजनाथ – बागेश्वर होते हुए इस क्षेत्र के भ्रमण का आनन्द लिया जा सकता है।

“ सरकारी (अन्धा) विकास यहां भी गतिशील है जो मुट्ठी भर ( अदूरदर्शी व शातिर) लोगों की जेबें अवश्य गरम करता है, सडृ्को का जाल अवश्य बन रहा है पर कच्ची पहाडियो का बिना उचित शोध किए अन्धाधुन्ध कटान का भविश्य क्या होगा ये तो समय ही बताएगा । कांडा व कपकोट एरिया से खड़िया पत्थर के खुदान से पहाड़ियां खोखली हो रही है जो कालान्तर में किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है । शराब की दुकानें अधिकतर बाजारों में विद्यमान हैं जो कि ‘मनरेगा’ आदि सरकारी योजनाओं का धन खपाकर स्थानीय नवयुवको को मानसिक खोखला करने को काफी है । स्थानीय किसान जंगली सूअरों व बन्दर, लंगूरों से आतंकित हैं जो फल बाग खेत सब रौंद डालते हैं।

“क्या ‘उत्तराखन्ड’ राज्य का उद्देश्य प्राप्त हो पायेगा या वक्त परिस्थियो व नियोजक/नीति-निर्धारको, शासन/शासकों की स्वार्थपूरक सोच के बीच हिचकोले ही भरता रहेगा” ऎसा हम सभी के सामने प्रश्न है। -----

3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी शुरुआत है, केवल भाईसाहिब! भुवन और मैं दोनों ने पढ़ा और आगे भी इन्तजार रहेगा! लिखते रहिये :-)

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  2. केवल जी, बहुत सुन्दर व सार गर्भित जानकारी अपने इलाके की दी है भाषा सौष्टव की दृष्टी से भी पूरा लेख अति सुन्दर है. हार्दिक बधाई. आपके अन्दर एक शोध छात्र तथा अन्वेषक की छबि दिखाई दे रही है. लिखते रहिये. हम पढते रहेंगे.

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  3. सर.. बहुत ही अच्छा लेख है, मैं तो आज देख रहा हूँ

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