शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

'जनक'


बचपन में, 'पिताजी' की अँगुली  थामे, टहलने पर  एहसास होता था, मानो सारी दुनियां मेरे नीचे है, मेरे पिताजी ही दुनियाँ के सर्व श्रेष्ठ पुरुष हैं. प्राइमरी स्कूल से मिडिल स्कूल, फिर हाईस्कूल , सुहाने दिन बचपन के, गर्व से जाने कब गुजर गए. हाईस्कूल से कालेज जाते ही परिस्थियाँ धीरे धीरे बदलने लगी , मेरी आवश्यकताएं बढ़ने लगी. आकांक्षानुरूप, पूर्ति का आभाव होने लगा तो बिपरीत भावों का उद्भव प्रारंभ होने लगा. चूँकि 'पिताजी' सरकारी मुलाजिम नहीं थे, खेती बाड़ी जंगलात कि छोटी मोटी ठेकेदारी से  गुजर बसर होती थी, इसलिए मुझे कुछ कमी सी महसूस होने लगी. आभास होने लगा कि मेरा आजतक का आकलन गलत था, मेरे 'पिताजी' के अपेक्षा  मेरे कुछ  दोस्तों के 'पिताजी' श्रेष्ठ हैं, अधिक विद्वान हैंशिक्षा पूर्ण होने परगांव से रोजगार तलाशने शहर आने पर, इस  स्थिति के साथ कुछ दयनीय भाव भी जुड़ने लगे - "हम तो दुनियाँ में बहुत पीछे रह गए, पिताजी भी अन्य लोगों कि भांति गांव छोड़ कर वक्त पर  शहर आते तो नौकरी पा जाते"आदि आदि.  
मै नौकरी करने लगाशनै:शनै:  'पिताजी' को इग्नोर करने लगा. घर परिवार की  जमेवारियां - भाई बहनों, अपनी शादी, भरपूर निभाई पर 'पिताजी' की राय  को कम महत्व दिया. 'पिताजी' पग पग पर सलाह देते जाते थे , मुझे लगता था - रूढीवादी, पुराने ख्यालों वाली बातें करते हैं . बात बात में उनकी बातें काटना, झिडकी देना,  मेरी आदतों में सुमार हो गया था. 'पिताजी' बिना किसी शिकन के  धैर्य से अपनी बात फिर भी कह ही देते  थे. अनसुनी करने पर , खीज कर कहते थे -" अरे सुन तो लो, आज नहीं तो कल याद करोगे". 

 समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा. मैं तीन बच्चों का 'बाप'  बन गया. 'माँ पिताजी' का  गाँव से  शहर आवागमन चलता रहता . मेरे कई  प्लान्स को भरपूर असहमति दे जाते. मैं भाव देता.

'पिताजी' अब बृद्ध हो चले थे. एकबार उन्होंने बड़े  शांत भाव से लगभग विनय के अंदाज में राय दी - 'बेटा  मेरा  शरीर क्षीर्ण होते जा रहा है, जाने कब बुलावा जाय, मेरी इच्छा है की कम से कम एक 'पौत्र' का तो "उपनयन संस्कार" देख जाता'. इस बार मैं विरोध नहीं कर पाया, उन्हीं के अनुसार 'ज्येष्ठ पुत्र' का "उपनयन संस्कार" कराया. साल भर में 'पिताजी' का स्वर्गवास  हो गया .

आज मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं. पग पग पर मुझे 'पिताजी' की 'सलाह मशविरे' की आवश्कता महसूस हो रही है, पर अब 'पिताजी' नहीं हैं. मैं व्याकुल होता हूँ, व्यथित होता हूँतरसता हूँ, 'पिताजी' के लिए, पर वो अब नहीं हैं.
कठिन से कठिन परिस्थितियों में, मेरे असहयोग के वावजूद,  वो कैसे अलौकिक धैर्य के साथ, समस्याओं का समाधान कर लेते थे, अनेक कोशिशों के बाद भी मैं अपने आप को असमर्थ पाता हूँ.  सच है – “अक्ल और उम्र में कभी भेंट नहीं होती.”  


शनिवार, 28 जनवरी 2012

'श्री तिरुपति बालाजी'


बिगत
 पक्ष में 'श्री तिरुपति बालाजीयात्रा का 'सौभाग्यप्राप्त हुआ."तिरुपति तिरुमाला देवस्थान"ट्रस्ट 
(TTD)  द्वारा संरक्षित, हरा भरा यह क्षेत्र अति सुरम्य  आनंद दायक है. 'तिरुपतिशहर (मैदानी क्षेत्रसे उत्तर - पश्चिम  को शुरू होती है 'तिरुमलापहाड़ियां. एक दिशा,  उर्ध्वगामी एवं निम्नगामी सर्पाकार सड़क मार्ग, पहाड़ी के  प्रथक - प्रथक दिशाओं से हो कर गुजरते हैं.  

लगभग ३०० बर्ष, ईशा पूर्व निर्मित "श्री वेंकटेश्वर" 'बाला जी' मंदिर,तिरुमला पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है १०० वर्ग गज मेंशानदार नक्कासी उध्रत, खालिश पत्थरों द्वारा निर्मितमुख्य मंदिरवर्गाकार हैमंदिर श्रंग शंकुस्वर्ण पट्टिकाओं द्वारा सुसज्जित हैंप्राचीन हिन्दुस्तानी शिल्प एवम वास्तु कला का अद्भुत प्रदर्शन दर्शनीय है. अन्दर विराजमान हैं - विभिन्न स्वर्णादिक आभूषणों लदे "श्री बालाजी", जिनके 'श्याम' मुखमंडल और हथेलियों के ही दर्शन हो पाते हैं. कहा जाता है यह भारत के धनाढ्य मंदिरों में से एक है. परिक्रमा स्थल के बाह्य वृत में, मुख्य मंदिराभिमुख, बिभिन्न मंदिर विद्यमान हैं.  परिक्रमा स्थल के बाह्य परिपथ में प्रशाद बितरण व्यवस्था है.बिभिन्न सुगन्धित,शुष्क मेवों व फलों का बना,विशेष स्वाद युक्त,यहाँ का 'लड्डू'(प्रशाद)जो लगभग ४०० ग्राम का होता है, प्रसिद्द है. मुख्य मंदिर का चित्र लेना मना है. 

चारों ओर उच्च चारदीवारी के पूर्व - उत्तर दिशा में मुख्य द्वार  है. चित्रों में यही द्वार दिखता है.  सामने विशाल स्थल यात्रियों के भ्रमण व अन्य सुविधाओं युक्त है.टीवी चैनल TTD  यहीं से लिए गए द्रश्य प्रसारित करता है. सामान्य दर्शकों को,  छुट्टियों के समय में, अत्यधिक दर्शकों के कारण, छः- सात दिन तक, लाइन में लगने के बाद, दर्शन सुलभ हो पाते हैं. शीघ्र दर्शन हेतु वी आई पी के अतिरिक्त,  र- ५०/- एवं र- ३००/- की टिकट व्यवस्था भी है. ई- टिकट दिल्ली- आंध्रा भवन से भी प्राप्त किए जाते हैं. यात्रियों हेतु बिश्राम गृह की व्यवस्था, २४ घंटे के लिए,  मात्र  र-५०/- में उपलब्ध है. उच्च आयवर्ग हेतु प्राइवेट गेस्ट हाउस हैं. अधिकतर भवन द्वितलीय हैं. एस . वी . म्यूजियम दर्शनीय है.

सम्पूर्ण तिरुमला क्षेत्र में नि:शुल्क बस सेवा (रथ) १५ मिनट पर उपलब्ध है. 'अन्न्दानम' में नि:शुल्क भोजन व्यवस्था है. अनुशाशित सफाई व् अन्य  व्यवस्थाएं अनुकरणीय  है. सम्पूर्ण तिरूमला की विद्युत् व्यवस्था 'वायु चालित टरवाइन टावर' द्वारा संचालित है. सम्पूर्ण क्षेत्र में मंदिर की कर्णप्रिय, मध्यम - मध्यम  मंत्रोच्चारण ध्वनी,जगह जगह खम्बों पर लाउड स्पीकर द्वारा प्रसारित होती रहती है.

'श्री हरि विष्णु' स्वरूप 'श्री बालाजी' को कल्कि अवतार माना जाता है. सच्चे भाव से मांगी गयी मन्नत अवश्यमेव पूर्ण होती है, ऐसी मान्यताएं हैं. तिरुमला से लगभग २० किमी दूरी पर 'श्री लक्ष्मी' स्वरूप  "देवी पद्मावती" का मंदिर है 'श्री बालाजी' दर्शन के बाद "देवी पद्मावती" के दर्शन करने पर यात्रा पूर्ण मानी जाती है, ऐसी प्रथा है. 'श्री बालाजी' मंदिर में सनातन हिन्दू संस्कार मुंडन, सष्ठी,उपनयन आदि संपन्न कराए जाते हैं जिनकी बहुत मान्यताये हैं.मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं द्वारा 'मुंडन' की प्रथा है. 
   
भक्ति, आस्थाओं से लबालब, सर्व वैभव परिपूर्ण यह क्षेत्र दर्शनीय है.  
बिधाता ने स्वर्ग  नरक इसी लोक में रचे हैं", 'उक्ति को मैंने सार्थक पाया. 




शनिवार, 14 जनवरी 2012

"शक्ति पुन्ज"

सर्ब विदित है - सुने, सुनाये तथ्य 'झूठ' हो सकते है , जो प्रत्यक्ष्य दृष्टीगत हो वह झूठ या मित्थ्या नहीं हो सकता क्योंकि वह 'सत्य' होता है. चूँकि 'सत्य' इश्वर का ही रूप है, इसलिए ब्रह्माण्ड में यदि कहीं "इश्वर" है तो वह है - साक्ष्यात 'शक्ति पुंज' "सूर्य".

युगों - युगों से, सर्वत्र, बिना भेदभाव के ऊर्जा प्रदान करने वाले, असीमित ऊर्जा के स्रोत "भगवान् सूर्य" दक्षिणायन पथ पूर्ण कर, मकर संक्रांति से उत्तरायण पथ को अभिमुख होते हैं और शने:- शने: बृद्धि को अग्रसर होते है.

दक्षिणायन और उत्तरायण के बीच का यह समय, 'मकर संक्रांति' पर्व के रूप में, पूरे भारत बर्ष में प्रतिवर्ष, विभिन्न त्यौहार स्वरूपों में - उत्तरायिनी (घुगुतियI), पोंगल, लोहड़ी आदि मनाया जाता है. उत्तराखंड के 'कुंमाऊं' में इस दिन प्रात: 'कौए' को बुला कर 'प्रथम भोज' देने की प्रथा है

प्राचीन ग्रंथों में इससे सम्बन्धित अनेक आलेख मिलते हैं. मकर संक्रांति को प्रात: स्नान, ‘सूर्य’ -पूजा अर्चना से मोक्ष्यदाई फल प्राप्त होते हैं, ऐसी मान्यताएं हैं. इस दिन, सम्पूर्ण भारत बर्ष में, नदियों के तट पर बसे शहरों के घाटों पर, स्नान कर, श्रद्धालु पुण्य कमाते हैं.

'मकर संक्रांति' की मंगल कामनाएं. आने वाले समय में सभी को 'शुभ फल' प्राप्त होवें.

बुधवार, 11 जनवरी 2012

'माली'



सींच रहे हो,
बगिया को-
और उसकी क्यारियों को -
बर्षों से-
आजमाई -
‘तुष्टि’ खाद,
‘बिभक्ति’ खाद,
‘केमिकल’ खाद,
किसम किसम की और भी खाद,
ऊपर से - इम्पोर्टेड खाद.

बगिया !
फिर भी बर्बाद .
‘घटिया’, घटती ‘पैदावार’,
बढती जाती 'खरपतवार',
बदले 'मालिक'
'माली' बदले
फिर वही -फटे हाल,
और पडौसी –
फटाफट आबाद.

'माली' ! !
सुन - पते की बात,
अबकी आजमा --
'अन्ना' खाद .
कम होगी- ‘खरपतवार’,

और बढ़ेगी ‘पैदावार’ l
फिर होगी, बगिया आबाद.

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

"एकाग्रता"

'ईश्वर' ने 'पृथ्वी' के समस्त जीवों में मनुष्य को श्रेष्ठतम मस्तिष्क / बुद्धि प्रदान की. इसी के साथ ही मनुष्य में 'सर्वोच्चता ' हांसिल करने की ‘तृष्णा’ भी जाग्रत हो गई. प्राचीन काल में ‘सर्वोच्चता ' को प्राप्त करने के लिए अनेकानेक प्रयोग हुए और सबसे कठिन मार्ग, 'तपष्या' (एकाग्रता) का मार्ग, उपयुक्त बताया गया. हमारे धर्म ग्रंथों में अनेक तथ्य संकलित हैं जो इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करते हैं.

ऋषि मुनियों ने एकाग्रता / तप के फलस्वरूप ‘दिव्य ज्ञान’ प्राप्त कर उसका सदुपयोग 'लोककल्याण' हेतु किया एवं दुर्पयोग होने पर बिनाशकारी परिणाम होने का सन्देश दिया. "दिव्य ज्ञान / शक्तियों" के उपयोग, दुरपयोग, सुप्रभाव, कुप्रभाव की अनेक कहानियां प्रचलित हैं.

यह सर्वथा शाश्वत सत्य है- जीवन का सबसे कठिन 'कर्म' है - "तपस्या ".

वर्तमान काल में हम लोग प्रयोगात्मक (वैज्ञानिक) खोज के सहज मार्ग पर शोधरत हैं. 'एकाग्रता' इस काल में भी उतनी ही कारगर है. बिना 'एकाग्रता' के नित नए कीर्तिमान असंभव हैं. वर्तमान काल में 'ज्ञान' की जगह 'धन' ने ले ली है. तब 'ज्ञान' के सापेक्ष 'धन' की कोई महत्ता न थी, अब 'धन' के आगे पीछे बड़े बड़े ज्ञानी - ध्यानी (स्वयंभू) घूमते दीखते हैं. लगता है 'ज्ञान' बिलुप्त होता जा रहा है.

आज 'येन केन प्रकारेण' स्वार्थपरक ‘धनोपार्जन’ ही जीवन का उद्देश्य सा बन गया है. धर्म शास्त्रों में 'धन' को देवी स्वरूप - 'श्री लक्ष्मी' माना गया है, जिसका मान, सम्मान / प्रबंधन यथोचित हो तो जन कल्याणकारी फल प्राप्त होते हैं और मान, सम्मान / प्रबंधन यथोचित न हो तो बिनाशकारी फल प्राप्त होते हैं. कभी कभी लगता है, हम इसी दिशा में बढ रहे हैं.

'धन' का आय / ब्यय मार्ग का प्रबंधन कैसा है - आर्थिक मोर्चे पर, हर तरफ असमंजस की स्थिति है. 'बर्ष २०११' में पूरी दुनियां इसी बिषय पर केन्द्रित /आंदोलित रही. हम भी इससे अछूते न रह पाए. उचित एवं उत्तम प्रबंधन में 'एकाग्रता' की अवश्यमेव आवश्यकता है.

आइए सब लोग मिलकर लक्ष्य बनाएं कि हम "एकाग्रता", 'धन' से अधिक, 'ज्ञान' को दे कर, अपने अपने क्षेत्र में, 'उचित एवं उत्तम प्रबंधन' को भरपूर महत्ता दें और आने वाले समय का सुखद अनुभव प्राप्त करें.

"सभी को 'नव वर्ष २०१२', की हार्दिक शुभ कामनाएँ "